रहगुज़र

कुछ दरख्त सी है;
मेरी जिन्दगी;
मंजिल नही कोई;
रहगुजर की;
बस बहता हुआ;
पतवार है।

ऐ नीड़ ए वफा;
तू रहमकर;
तेरे ही से मुझमे;
रफ्तार है।

जहर है;
सर ए हवा मे;
ऐ पानी भी;
तुझमे खुलेआम है।

करूँ क्या;
ऐ जिन्दगी;
तू हर जगह;
ताड़-ताड़ है।

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छलवा

‘हम होंगे क़ामयाब एक दिन’
यह ’एक दिन’;
आशा के आकाश में टंगा;
वह छलावा है;
जिससे ठगे जा रहे हैं;
हम
हर बार, हर दिन।

क़ामयाब उछालते हैं;
ऐसा नारा…;
क़ामयाबी भविष्य में नहीं;
इसी वक़्त है…;
और है, इसी दिन ।

फिर तो;
आत्मविश्वास में;
पैदल चलना ..;
संदेह में;
दौड़ने से …;
कहीं बेहतर है।

भ्रम हमेशा….;
गंतव्य को दूर ले जाता है….;
और यथार्थ में ….;
चाँद भी ;
समीप में दिखता है।

(28 नवम्बर, 2017)

अंडमान में अमेरिकी नागरिक के मौत में आया नया मोड़, धर्म परिवर्तन कराने की थी मंशा

North Sentinel Island:
देश Nov 22, 2018 03:35 PM IST Rakesh Singh hindi.latestly.com
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North Sentinel Island: अंडमान निकोबार द्वीप समूह (Andaman and Nicobar Islands) के उत्तरी सेंटीनेल द्वीप में सेंटीनेल जनजाति के आदिवासियों ने तीरों से एक अमेरिकी नागरिक जॉन एलन चाऊ की हत्या कर दी. हम आपको बता दें कि ये जनजाति बाहरी दुनिया के संपर्क में रहना पसंद नहीं करती हैं. खबर है कि जब स्थानीय प्रशासन अमेरिकी नागरिक जॉन एलन चाऊ के शव ढूंढने के लिए वहां पहुंची तो इन्होंने हेलिकॉप्टर पर भी तीरों से बौछार किये. जिससे सुरक्षा कर्मियों को खाली हाथ लौटना पड़ा.

North Sentinel Island: अंडमान में अमेरिकी नागरिक के मौत में आया नया मोड़, धर्म परिवर्तन कराने की थी मंशा
सेंटीनेल द्वीप के आदिवासी (Photo Credit: You Tube)
अमेरिकी अधिकारियों की शिकायत के बाद पुलिस ने सातों मछुआरों को गिरफ्तार कर लिया किया है, और पुछताक्ष जारी है. बताया जा रहा कि यही मछुआरे चाऊ को लेकर सेंटीनेल द्वीप पर गए थे. स्थानीय लोगों से बातचीत में पता चला है कि ये जनजाति बाहरी दुनिया के संपर्क में रहना पसंद नहीं करती हैं. मछुआरों ने पुलिस को बताया कि वे 14 नवंबर को सेंटीनेल द्वीप पर जाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन सफल नहीं हुए. जिसके बाद वह पुनः 16 नवंबर को पूरी तैयारी के साथ द्वीप पर पहुंचे. मछुआरों के मुताबिक, चाऊ ने जैसे ही द्वीप में कदम रखा, उन पर धनुष-बाण से वहां के लोग हमला करने लगे. मछुआरों ने बताया कि उनके व्यक्तिगत जीवन में दख़ल देने के प्रयास के कारण हमला हुआ. हमले के बाद चाउ जान बचाने के लिए इधर उधर व्यग्र भयभीत हो भाग रहे थे. परन्तु वहीं आदिवासी किसी एक भी मछुआरे पर हमला नहीं किए.

चाऊ की हत्या करने के बाद आदिवासी उनके शव को रस्सी से घसीटते हुए समुद्र तट तक ले गए और शव को रेत में दफना दिया. मछुआरों ने बताया कि यह देखकर वे डर गए और वहां से भाग खड़े हुए. अगले दिन सुबह मछुआरे दोबारा सेंटीनेल द्वीप पहुंचे तो चाऊ का शव समुद्र के किनारे पड़ा मिला. लेकिन वे लाख कोशिशों के बावजुद एलन चाऊ का शव नही ला सके.

घटना के बाद मछुआरों ने पोर्ट ब्लेयर पहुँचकर मामले की जानकारी चाऊ के दोस्त और स्थानीय उपदेशक एलेक्स को दी. एलेक्स ने अमेरिका में रहने वाले चाऊ के घरवालों को घटना के बारे में बताया, जिन्होंने नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास से मदद मांगी. एलेक्स ने बताया कि पिछले कई साल में चाऊ कई बार अंडमान जा चुके थे. चाऊ खुद भी उपदेशक थे, जो सेंटीनलीज से बातचीत करके उनका धर्म परिवर्तन कराना चाहते थे. लोगों ने बताया कि उच्चस्तरीय पहुंच और अनुमति के बाद ही कोई भी व्यक्ति अंडमान निकोबार के प्रतिबंधित क्षेत्र में जा सकता है.

टैग: NORTH SENTINEL ISLAND अंडमान निकोबार द्वीप समूह आदिवासियों जॉन एलन चाऊ सेंटीनेल द्वीप हेलिकॉप्टर

जनजातीय क्षेत्र अध्ययन, बस्तर (छत्तीसगढ़)

राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच (FANS)

जनजातीय क्षेत्र अध्ययन, बस्तर (छत्तीसगढ़)

जिला–बस्तर, नारायणपुर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकुमा

विषय: छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में जनजातीय लोगों के शिक्षा और स्वास्थ्य पर अध्ययन

बारह सदस्यीय अध्ययन दल ने बस्तर संभाग के पांच जिलों नारायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा और बस्तर में 20.9.2018 से 28.9.2018 तक जनजातीय क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य की वास्तविक स्थितियों और चुनौतियों पर अध्ययन किया। इन नौ दिनों में हमारी टीम ने ग्रामीणों, शिक्षकों, चिकित्सको, जनप्रतिनिधियों, प्रखंड और जिला स्तरीय अधिकारियों, सुरक्षा बलों से परिस्थितियों का जायजा लिया।

जनजातीय क्षेत्र अध्ययन, बस्तर (छत्तीसगढ़)

अध्ययन के दौरान अध्ययन दल के अवलोकन में निम्नाकित तथ्य जानकारी सामने आयी:

*~शिक्षा~*

शिक्षा के क्षेत्र में कक्षा का स्तर बढ़ने के साथ-साथ बच्चों का ड्रॉपआउट भी बढ़ा है, खासकर बालिकाओं ने ज्यादा स्कूल छोड़ा। दूसरी सबसे बड़ी दिक्कत है, क्षेत्र में पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण शिक्षकों की कमी। संसाधनों की कमी दल को हर जगह नजर आया। सफाई के बारे में जागरूकता की काफी कमी पाई गई। हालांकि पिछले कुछ सालों में पढ़ने की उम्र वाले बच्चों ने ज्यादा से ज्यादा स्कूल पहुंचना शुरू कर दिया है, जो अपने आप में एक बड़ी सफलता है। कुछ जगहों में यह देखा गया कि शिक्षकों और बच्चों ने सीमित संसाधनों में अभूतपूर्व बदलाव लाया है। आवासीय स्कूलों ने बच्चों की उपस्थिति को काफी बढ़ाया है। इसके अलावा बच्चों की मातृभाषा को समझकर उन्हें हिंदी में पढ़ाने में कठिनाई होती है। संचार में होने वाली रुकावटों की वजह से काफी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।

*~स्वास्थ्य~*

स्वास्थ्य के क्षेत्र में लोगों का पारंपरिक उपचारों से आधुनिक मेडिकल साइंस में भरोसे का ग्राफ बढ़ा है। अस्पतालों में डॉक्टर्स और स्पेशलिस्ट की भारी कमी दिखी। स्त्री विशेषज्ञों की नियुक्ति न के बराबर थी। स्वास्थ्य सुविधाओं को सब तक पहुंचाने में संचार में अवरोध एक बड़ी समस्या पाई गई। पूरे बस्तर डिवीजन में पाई जाने वाली कॉमन बीमारियां, मलेरिया, चर्म रोग, टीबी, एनीमिया, कुपोषण हैं। इसके अलावा गुप्तांग रोग और अल्कोहल और तम्बाकू जनित बीमारियां पूरे क्षेत्र में आम हैं। ब्लड डोनेशन से जुड़ी गलतफहमियों की वजह से ब्लड बैंकों में खून की सप्लाई में दिक्कत आती है। स्किल्ड मितानिनों की कमी की वजह से सुदूर क्षेत्रों में उपजी स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने में काफी मुश्किलें आती हैं।

अध्ययन दल द्वारा किए गए शोध का जिलावार निष्कर्ष :

जनजातीय क्षेत्र अध्ययन, बस्तर (छत्तीसगढ़)

*~नारायणपुर~* (20.9.2018- 21.9.2018)

दल 5 गांवो में गया। बासिंग, मुरहापदर, छोटे डोंगर, ओरछा, गुदाड़ी। इन गांवों के स्वास्थ्य और शिक्षण केंद्रों का प्रत्यक्ष अध्ययन – निरीक्षण किया। यहां के जिलाधिकारी, पुलिस अक्षीक्षक से भी मुलाकात हुई। इस क्षेत्र में—-

*~स्वास्थ्य की बड़ी दिक्कतें~*
ज्यादातर लोग और मुख्यतः महिलाएं एनीमिक हैं। आयरन की गोलियां बांटी जाती हैं, खान-पान में आयरन की कमी की वजह से दिक्कतें हैं। जिलाधिकारी के मुताबिक, ‘नारायणपुर में जिला मुख्यालय को छोड़कर केवल दो ही एमबीबीएस डॉक्टर तैनात हैं’। मुख्य सड़क से गांवों की दूरी जितनी बढ़ती है, स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता और सुविधाएं घटती जाती हैं।

*~सकारात्मक बातें~*
अस्पतालों में डिलीवरी की संख्या बढ़ी है। टीकाकरण की संख्या बढ़ी है। यहां पर परिवहन और संपर्क समुचित न होने के बावजूद स्थानीय स्वास्थ्यकर्ताओं की उपस्थिति ने स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच का दायरा बढ़ाया है।

*शिक्षा के बारे में दिक्कतें~*
सुदूर क्षेत्रों से बच्चों को स्कूल तक लाने में दिक्कतें आ रही है। अभिभावकों को शिक्षा का महत्व नहीं मालूम। ज्यादा माओवादी आतंकवाद से प्रभावित होने के कारण शिक्षकों में भय का माहौल, जिससे अंदरूनी क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया नहीं हो पा रही। अनुदेशक और अनुदेशिकाएं, जिनका काम पोर्टा केबिन स्कूल में बच्चों की देखभाल करना है, वे अध्यपाकों की कमी के कारण बिना किसी ट्रेनिंग के पढ़ा रहे हैं। प्रशिक्षण केंद्रों के पास इन्हें प्रशिक्षित करने का कोई प्लान नहीं है।

*~सकारात्मक बातें~*
इतनी अतिवादिता के बावजूद पोर्टा केबिन्स का कॉन्सेप्ट बेहतरीन है। ओरछा जैसे सुदूर इलाके में भी बच्चों का खेल की राज्य स्तरीय टीमों में खेलना एक सकारात्मक पहलू है। रामकृष्ण मिशन के स्कूलों में बच्चों की संख्या के साथ-साथ शिक्षा गुणवत्ता भी स्तरीय था।

जनजातीय क्षेत्र अध्ययन, बस्तर (छत्तीसगढ़)

*~दंतेवाड़ा~* (22.9.2018-23.9.2018)

नौ गांवों –कटेकल्याण, परचैल्ली, नयापारा, नयानाल, अरनपुर, मांडेंदा, पालनार, जारम और मेटापाल के शिक्षण और स्वास्थ्य केंद्रों का प्रत्यक्ष अध्ययन

*स्वास्थ्य के बारे में दिक्कतें~*
गाँवों के अंदर मलेरिया, गुप्तांग रोग, चर्म रोग और टीबी समान्य बिमारी हैं। परिवार नियोजन के बारे में बहुत सारी भ्रांतियां फैली हुई हैं। पुरूष परंपराओं का हवाला देकर निरोध का इस्तेमाल नहीं करते हैं। महिला चिकित्सक और चिकित्सकिय कर्मचारी की कमी के कारण महिलाओं को समुचित इलाज नहीं मिल रहा है।

*~सकारात्मक बातें~*
नारायणपुर की तुलना में दंतेवाड़ा में सड़क अच्छी होने के कारण स्वास्थ्य सुविधायें सूदूर इलाकों में पहुंच चुकी हैं। यहां पर त्रिवर्षीय कोर्स वाले डॉक्टर जैसे ए के अंसारी सराहनीय कार्य कर रहे हैं। इलाके में और सुरक्षा कैंपों के बनने से विश्वास बहाली हुई है जिससे स्वास्थ्यकर्मी अंदर तक जाते हैं और मरीज भी अस्पताल तक पहुंचते हैं।

*~शिक्षा की दिक्कतें~*
कैंप बन जाने के बाद भी शिक्षक अंदर तक नहीं पहुंच पाते हैं। जिन स्कूलों में अध्ययन दल ने विजिट किया वहां पर वाणिज्य की पढ़ाई नहीं होती है। इस इलाके के शौचालयों में सफाई की स्थिति दयनिय हैं।

*~सकारात्मक बातें~*
एजुकेशन सीटी में आस्था जैसे शैक्षणिक संस्था का होना इस क्षेत्र के विकास का परिचायक हैं। प्राथमिक स्कूलों की अपेक्षा इस इलाके के पोर्टा केबिन में स्तरीय सुविधायें जैसे वाई-फाई, साफ-सफाई, पॉक्सो बॉक्स और प्रयोगात्मक कक्षायें मिली। दूसरे इलाकों के मुकाबले यहां संविदा के शिक्षक भी मोटिवेशन के साथ काम कर रहे हैं।

जनजातीय क्षेत्र अध्ययन, बस्तर (छत्तीसगढ़)

*~बीजापुर~* ( 24.9.2018-25.9.2018)

यहां पर 16 गांवों – भोपालपट्टनम, पिचनू, दुधेड़ा, पेंगड़ापल्ली, पासेबाड़ा, संगमपल्ली, मद्देड़, तिमेड़, चेरपल्ली, माझीगुड़ा, गंगालूर, तोड़का, गोंगला, हिरापुर, सरकीगुड़ा, तर्रेम में गये

*~स्वास्थ्य में दिक्कतें~*
बीजापुर में माओवादी दुष्प्रभाव के कारण स्वास्थ्य सुविधाएं सूदूर क्षेत्रों तक प्रभावी पहुंच नहीं बना पाई हैं। परिवहन और संचार की दिक्कतों के कारण एंबुलेंस बुलाने के लिए गांव वालों को कैंप तक आना पड़ता है जिससे स्वास्थ्य सुविधाओं में देरी हो जाती है। हमारी टीम को कई दवाई केंद्रों पर दवाई की कमी दिखी उसमें सामुदायिक केंद्र भोपालपट्टनम के कैंपस में एक प्राइवेट मेडिकल स्टोर मिला।

*~सकारात्मक बातें~*
बीजापुर में सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यहां के ब्लड बैंक का 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा सुरक्षा बलों से मिलता है. बीजापुर का जिला अस्पताल में हमें ज्यादातर विशेषज्ञ चिकित्सक मिले. गंगालूर का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बिजापुर के सभी अस्पतालों के लिए मशाल है जहां पर विशाल स्वास्थ्य शिविर आयोजित कराये जाते हैं। हमारी टीम ने ऐसे ही एक शिविर का अवलोकन कर सकारात्मक पहलू पाये।

*~शिक्षा की दिक्कतें~*
156 प्राथमिक और तीस माध्यमिक विद्यालय माओवादी आतंकवाद के कारण बंद कर दिये गए हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा के साथ-साथ खेल सुविधाओं में भी कमी मिली. जाति प्रमाण पत्र नहीं बनने के कारण ड्रॉप आउट बढ़ती हुई मिली।

*~सकारात्मक बातें~*
गंगालूर में सी -85 बटालियन के कुछ अधिकारी स्थानिय बच्चों को पढ़ाते हैं जिससे लोगों में सुरक्षा बलों के प्रति विश्वास बहाली हुई हैं। पढ़ाये गए बच्चों में एक बच्चे का नवोदय में चयन हुआ। जिला मुख्यालय में स्पोर्टस एकेडमी की उपस्थिति ने इस क्षेत्र के भविष्य को सुनहरा बनाने की ओर कदम रख दिया हैं। यहां पर कई खेलों में बच्चों ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेला हैं।

जनजातीय क्षेत्र अध्ययन, बस्तर (छत्तीसगढ़)

*~सुकमा~* (26.9.2018-27.9.2018)

यहां पर 20 गांवों – गारीदास, डब्बारास, कुट्टागुड़ा, पोंगाभेजी, बोड़को, केरलापार, दोरनापाल, झापरा, पेदापुट्टी, कोंटा, एर्राबोर, मुरलीगुड़ा, पेदाकूर्ती, दुब्बाटोंटा, चिकपाल, इरापट्टी, पाकेला, छिंदगढ़, पेरमारस, तोंगपाल में दल ने भ्रमण किया।

*~स्वास्थ्य में दिक्कतें~*
सुकमा के नाम पर आम तौर पर सरकारी कर्मचारियों में माओवादी भय, आतंक के कारण डर का माहौल, जिससे उनकी पहुंच का दायरा कम है। अस्पतालों में डिलीवरी का दर बस्तर के बाकी जिलों से कम है। मितानिन की कम समझ इसका एक बड़ा कारण है।

*~सकारात्मक बातें~*
आयुष्मान भारत की उपलब्धता स्वास्थ्य सेवाओं की समस्यायों के समाधान में प्रभावी भूमिका निभाने की संभावाना हैं। जहां भी अस्पताल मिले वहां ब्लड टेस्ट की सुविधायें मिली। यहां के ब्लड बैंक में अभी तक ब्लड की कमी नहीं मिली पिछले कुछ महीनों का रिकार्ड देखने के कारण। इसका एक बड़ा कारण है कि यहां पर सोशल मीडिया (व्हाट्सअप ग्रुप) के माध्यम से कई स्थानिय युवा व्लड देने के लिए सक्रीय हैं।

*~शिक्षा में दिक्कतें~*
शिक्षकों को यह महसूस हो रहा है कि जो प्रशिक्षण उन्हे दी जाती है वो उनके बच्चों के लिए ज्यादा उपयोगी नहीं हैं। यहां पर ज्यादातर स्कूल इमारतें जर्जर हालात में मिलीं. आवासीय बालिका स्कूलों में कई जगह नहाने की व्यवस्था खुले में हैं। अधिक्षक की लापरवाही भी सामने आई।

*~सकारात्मक बातें~*
माओवादी आतंक से ग्रसित गांवों में जहां स्कूल बंद कर दिये गए थे वहां पर स्थानिय पढ़े-लिखे युवाओं की मदद से हर गांव में बंद स्कूल खोले जा रहे हैं। इस साल 65 विद्यालय खोले जा चुके हैं। इसमें पढ़ाने वाले युवाओं को शिक्षा दूत के नाम से जाना जाता है। एजूकेशन सिटी में आकार, साकार, आरोहण और ज्ञानोदय जैसे संस्थाएं सुकमा के शैक्षणिक विकास में एक मॉडल बन रही हैं।

*~बस्तर~* (28.9.2018)

पांच जगहों – जगदलपुर, दरभा, लोहंडीगुड़ा औऱ मुण्डागांव के स्वास्थ्य और शिक्षा केंद्रों पर गए

*~स्वास्थ्य में दिक्कतें~*
यहां पर एमडीआर टीबी के मरीजों की अधिकता हैं। कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर एमडीआर मरीजों की संख्या कुल मरीजों का दस प्रतिशत तक पाया गया। यहां पर कुपोषण की सबसे ज्यादा केसेस मिले एक चिकित्सक के अनुसार यहां पांच हजार से ज्यादा बच्चे कुपोषित पाये गए।

*~सकारात्मक बातें~*
यहां पर अस्पताल में डीलिवरी की संख्या 90 प्रतिशत से ज्यादा पाई गई क्योंकि यह बस्तर संभाग के बाकी जिलों के मुताबिक ज्याद विकसित है। यहां स्वास्थ्य सुविधायें तुलनात्मक रूप से अच्छा होने का एक प्रमुख कारण बलराम कश्यप मेमोरियल सरकारी मेडिकल कॉलेज और जगदलपुर जैसे शहर का होना भी है।

*~शिक्षा में दिक्कतें~*
पोर्टा केबिन में बच्चों की संख्या बहुत ज्यादा होने के कारण उन्हें अनुशासित करने में दिक्कतें आती हैं.। एक ही कक्षा में अलग-अलग उम्र के बच्चों के होने कारण दिक्कतें। ज्यादातर जगहों पर बैठने की दिक्कतें थीं।

*~सकारात्मक बातें~*
यहां पर कुछ स्कूलों के हॉस्टल में बच्चों को टीवी भी दिखाया जाता है। कम्प्यूटर और सौर उर्जा का इस्तेमाल भी देखने को मिला।

बस्तर संभाग के विकास के लिए अध्ययन दल के अनुभवों के अधार पर सुझाव :

1. शिक्षा और स्वास्थ्य में एक व्यापक सुधार के लिए व समावेसी बनाने के लिए स्थानिय सुदूर अंदर के गाँवों के बालक बालिकाओं का चयन शिक्षक व नर्स के लिए करना।
2. इस शिक्षक व नर्स के चयन मानक में एक विशेष ढील देना। ताकि अंदर के ग्रामों के अभ्यर्थियों का चयन किया जाय सके। शिक्षक दसवीं पास और नर्स 8वीं पास का चयन
3. एक दीर्घकालिक योजना प्रत्येक जिला में शिक्षक व नर्स प्रशिक्षण का संस्थान खोला जाय, जिसमें इनके प्रशिक्षण हेतु 4 वर्षीय समेकित पाठ्यक्रम, 4years integrated course तैयार किया जाय। ताकि अभ्यर्थी इसमें स्नातक सह शिक्षित शिक्षक बन सके एवं बालिकाएं अन्तरमध्यमिक 12वीं के स्तर की प्रमाणपत्र के साथ NMA नर्स की प्रशिक्षण पूर्ण कर लें।
4. परिवहन और संचार दिक्कतों से निपटने के लिए डिजीटलीकरण का व्यापक प्रभाव हो सकता है। इसमें शिक्षकों के प्रशिक्षण और टेली मेडिसिन को शामिल किया जा सकता है.
5. 12वीं तक पढ़ने के बाद स्थानिय स्तर पर यहां के बच्चों को स्पेशल स्कीम के तहत नौकरी उपलब्ध कराई जाए जिससे वे अपने शिक्षा का सदुपयोग कर पायें और आने वाली पीढ़ी के लिए विकास का मार्ग प्रशस्त कर पायें।
बीजापुर की तर्ज पर प्रत्येक जिलों में स्पोर्टस एकेदमी की स्थापना की जानी चाहिए जिससे बच्चों की स्थानिय क्षमता का भरपूर इस्तेमाल किया जा सके।
6. जिला अस्पतालों से गांवों की दूरी 100 किमी तक है। इसलिए हर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में एक ब्लड स्टोरेज रखा जाए जो जिला मुख्यालय में स्थित ब्लड बैंक की निगरानी में चले।
7. रक्तदान के लिए हर जिले में एक वैन उपलब्ध कराई जाए जिससे रक्त की उपलब्धता पढ़ागी।
8. हर जिले में पाठ्यक्रम के अलावा एक पुस्तिका बांटा जाए जिसमें उस क्षेत्र में शहीद हुए जवानों की गौरवगाथा शामिल किया जाए।
9. टीम द्वारा विजिट किए गए तकरीबन सभी गांवों में माहवारी के बारे में जागरूकचता न्यूनतम थी. फ्री में या फिर न्यूनतम दामों पर सैनिटरी नैपकिन वितरित करने की सख्त जरूरत है।

Press conference, Raipur

काल के गाल से

काल के गाल से, सरासर
निकलता जा रहा हूँ।
दिखते हैं दानव कहीं,
दानव जो देखते नहीं,
मैं तो अपनी सीधे नजर के,
सामने से निकलता जा रहा हूँ।
दानव भी सर झुकाये, मुँह छिपाए
पगडंडियों के रास्ते निकलते जाते हैं।

पता न,
सीधी नजर चलते मैं डर रहा,
कि मुँह छिपाए, सर झुकाये
पगडंडियों से खिसकते वे डर रहे।
रात के सन्नाटे में,
घनघोर कूप अंधेरी इस रात में,
जीरम घाटी में सनसनाती हवा
के, भयानक व करुण शोर में,
सीधे चलता बाघ हूँ मैं, कि
जंगल की पगडंडियों पर,
घिसकते दानव शेर हैं।

उनकी दानवी उच्छवासें,
दरभा से जीरम तक,
छाई हुई है।
तो सत्य के पंजे,
बस्तर की शान्ति समृधि हेतु,
फैले हुये हैं।
एक वह भी समय था,
कभी बड़े ही निकट से,
देखा हूँ गरजती हुई बंदूकों को,
सर झुकाये, मुँह छुपाये,
पगडंडियों से खिसकते हुए।
पिपराढ़ी सुल्तान की स्तब्धता,
दानवी उच्छ्वासों से भरी,
बागमती-बकैया का छाडन,
तब चलते हुए मेरे कदमों से,
टूटी थी वह नीरवता।
हिलते हुए मेरे पंजों से,
छटे थे उन उच्छ्वासों की,
काली जहरीली धुँआ भी ।

चित्रकोट जलप्रपात, बस्तर , छत्तीसगढ़

आरक्षण

यह कैसी व्यथा है !
यह उनकी व्यथा है;
जिन्हें अरसों से आज भी
बहुत दबाया गया
जी भर कुचला गया
चहुँ दिश सरेआम अपमानित कर
अपमान का ज़हर
शदियों से पिलाया गया

आज वे भी
उठना चाहते हैं
अपने आप में
भले ही वैशाखी के सहारे
आरक्षण की, क्योंकि वे
स्वस्थ नहीं हैं, अपंग हैं
अब वे जुटना चाहते हैं
एक साथ हो कर ।

और इनका कहना है
ये हमारे हक़ खा गये
नीचे से ऊपर आकर
हमारे भविष्य को
कोख में ही
जन्म से पहले खा गये।
यह कैसी व्यथा है!
यह जिनकी व्यथा है।
यह इनकी व्यथा है।

कूप

वो अंतर्देशीय पत्र

उस हल्की नीली सी
बन्द अंतर्देशीय में
थोड़ा भीगा, थोड़ा दहकता
सा सन्देश, वो संदेश!
पोस्टकार्ड में लिखा
हुआ सा आदेश।
वो पोस्टमैन की
भारी सी आवाज
कहाँ गयी!
इन्तजार की चन्द
घड़ियाँ कहाँ गयी।
अपनों की जुबानी में
सपनों की कहानी
एक दूजे को दूर होते भी
नजदीक मिलाने के
बहाने कहाँ गए।
भावनाओं को व्यक्त
करने के ज़माने कहाँ गए।

ऊब चुका हूँ…
मोबाइल पर बात
व्हाट्सएप व फेसबुक पर
चैट करते करते।
अब कोई वो डाकिया के
खत वाला वक़्त लौट दे।
अब हर पल मैसेज आता है…
पर वो सुकून कहाँ!
जो
महीनों से आने वाली
चिठी में मिलता था, जिसे
रख के नजरों के सामने
कभी हल्की सी मुस्कराहट
कभी आसुओं की डबडबाहट
या फिर निश्चिंतता के आनन्द
एक सुकून की नींद सो जाया करते थे।

थोड़ा लिखा ….. बहुत समझना

आओ भारत बन्द करें

वह भी एक पेट की आग ही थी
जो कचरे से खाना चुनती थी
कभी पानी से रोटी खाती थी
या फिर पानी पी-पीकर भूख मिटाती थी

व्यंजनों की भीड़ में
स्वादों के मेले में
एक एक कर चखने वालों
आयोजनों प्रयोजनों में
मेन्यू ज्यादा रखने वालों
भरी थाली अन्न फेकने वालों
शानों शौकत के दीवानों
दमकती चमकती उतावली
झूठी दुनिया में जीने वालों
अपनी अपनी जेबों को
सट्टा बाजी में लगाओ और
अपने अधिकारों को, यों
फिर से आजमाओ
इधर उधर अराजकता
जमकर फैलाओ
वह भी क्या? पेट्रोल
में लगी आग
तुम देश में सर्वत्र
आग लगाओ, जो
सिर्फ और सिर्फ
सत्ता हथियाने की
आग है…..

फिर तो
आओ भारत बन्द करें
प्रगति का चक्का मंद करें।
आओ भारत बंद करें।।
ठलुओं की फ़ौज जुटाओ
कुछ गुंडे भी मंगवाओ
हाथों में नारों की तख्ती,
गुंडों के हाथों में लाठी
जो तोड़ फोड़ भी चंद करें।
आओ भारत बंद करें।

दुखियारी

कर्मयोग

कि उसने सुनिश्चित किया है;
कि हम सब अपनी अपनी;
कथाओं में एकाकी हैं;
कि ये यात्रा भी एकाकी है;
सुख-दुःख, आहें, साँसे;
सब एकाकी है।

इसीलिए
तुम्हारी चुनौतियों को स्वीकारा हूँ।
हे प्रभु ! हे माधव!
सुनो जब अकेला होता हूँ;
नहीं पुकारता तुम्हें;
जीता हूँ अपना एकाकीपन;
सिरहाने कभी उदासी,
कभी स्मृति, कभी कोई..
कविता विछाकर।
पर ये गुमान न करना, जो
तुमने गीता में कहा है कि
तुम्हारे “कर्मयोग” का दास हूँ।

नहीं करता हूँ स्मरण तुम्हारा;
फिर भी खुद के द्वंदों में;
उठकर खड़ा होता हूँ;
एक भारी अट्टहास, कि
मन्द मुस्कराहट के साथ।

हरि ने छिपकर,
मुग्ध दृष्टि डाली थी।
रात यदि श्याम नहीं आये,
तो मैं इतने गीत सुहाने,
किसके संग गाए।

हरि ने छिपकर
मुग्ध दृष्टि डाली थी
रात यदि श्याम नहीं आये,तो
मैं इतने गीत सुहाने किसके संग गाए !!

यात्रा -एक कविता की

जन्म लेना कविताओं का,
एक यात्रा ही मात्र है।

जब जब;
कीचड़ से सने,
धूल से भरे,
छालों भरे पाँव लिए…।

जब,
स्वेद से सराबोर तन,
धूप से जले चेहरे…।

और भी,
बारिशों से भीगे कुर्ते में की गई यात्राएँ… ।

कितनी सरल होती हैं न,
उतनी ही भोली होती हैं न,
देशज शब्दों की चादर ओढ़ी ये कविताएँ ,
ये आपसे,
जूते ,
रंगीन छतरीयाँ ,
या रेनकोट नहीं माँगती….।
तभी तो,
जिस सुंदरता को रचने में,
ईश्वर असमर्थ होता है,
उसे कवियों के भरोसे,
छोड़ देता है।

जब रिश्ता बनता है,
इन कविताओं से तो,
ये हँसीं माँगती है,
आँसू माँगती है

कविताएँ,फिर इसके शब्द;
एक तेज धारदार शस्त्र है;
जिसके वार;
आत्मा छीलते हैं…।

अनंत रेगिस्तान है;
मैं अकेला चल रहा हूँ;
मेरे पास भी बादल नहीं…।

झिलमिलाती साया सा;
शनैःशनैः डोलता;
दूर जो एक पेड़ खड़ा;
मेरा मंजिल वही है;
लेकिन,
पेड़ में आत्मा नहीं…।

हाँ,
मैं अकेला था;
हाँ,
मैं सुकून से रो पाया…।

जब,
एक रोज दुनिया में;
सदा के लिए रात हो गई;
किसी के पास जुगनू थे;
किसी के पास उम्मीद।
पर,
मेरे पास कविता थी…;
और साथ ही,
मेरी आत्मा के दाएँ हिस्से में है;
वह एकाकीपन;
जो मुझे कभी अकेले नहीं छोड़ता।
जबकि
मेरी आत्मा में बायाँ हिस्सा नहीं है।।

कविता